गुरुवार, 6 मई 2010

काश!





काफिला मेरा भी होता, आज तब मंजिल के पास,
भोर होते चला होता, मंजिल की जानिब मै काश!

जज्बातों से क्या मिला, मंजिल मिली न रास्ता,
आँखों ने नींदे खोई और हर पल रहा दिल उदास,

एक परिंदा, एक दरिंदा उड़ रहे हैं, साथ साथ,
एक को जीने की ख्वाहिश एक को लहू की प्यास

हिम्मत कर और एक बाजी खेल जाएँ चल 'पवन'
हार जाने से बदतर है, हार मानने का एहसास।

4 टिप्‍पणियां:

  1. apne ahsaaso ko kitni marmikta ke saath pesh kiya hai,bahut acchi racna hai.badhai ho aapko...

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  2. Bindas ...... I saw this type of way of expression in past ... Now a days , You are trying to explore your self ...I want to be you at stage , when you will back to India....

    Thanks & Regards
    ================
    Yogesh Dhiman

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