रविवार, 9 मई 2010

आपदा ( हैती )

चंद पलों का जलजला ,
और फिर ठहराव
अनथक चीखें
उजड़े हुए गाँव।
जीवन के लिए याचनारत
आधी दबी देह
कहीं शिशु की क्षत देह पर
क्रंदन रत नेह।
कहीं घर से गृहणी छिनी
कहीं बच्चो से बाप
प्रभु यह कैसी लीला
यह कैसा संताप?
जीवन तुम्हारे लिए
रंगमंच है परिहास है,
पर हम कठपुतलियों में
संवेदना है, एहसास है।
अगर प्रेम हमारी
कमजोरी है, भूल है
तो प्रेमविहीन जग
अर्थहीन है , निर्मूल है।
तुम अपना खेल खेलो प्रभु
और हम अपना
तुम विध्वंश रचो
और हम सुहाना सपना ।
तुम जितना उजाड़ोगे ,
हम फिर से घर बनायेंगे
जीवन की सार्थकता
हम इसी संघर्ष में पायेंगे।






1 टिप्पणी:

  1. जीवन की सार्थकता
    हम इसी संघर्ष में पायेंगे। bahut sakaratmak vichar hai aapke,isi jajbe ke sath aap vaha kam karte rahe aur logo ke jeevan me aas bharte rahe.shubhakamnaye

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