गुरुवार, 27 मई 2010

शहरी

दिल्ली-हरिद्वार राजमार्ग को
पार करने से पहले  वह बच्चा
गाडी गुजरने का इंतज़ार करता था/
फिर सिर पर गठरी रखे हुए
जैसे ही सड़क पार करता था/
वह बुदबुदाता था, कि यह शहर वाले 
अलसुबह कैसे जाग पाते हैं?
मौका मिलते ही क्यों
अपना शहर छोड़कर भाग आते हैं/
पर अब शहरी आदमी का दर्द
उसे समझ आता है/
जब वातानुकूलित कमरों में नहीं,
अपितु वृक्ष क़ी छांव  तले
उसका तन, मन विश्रांति पाता है/





4 टिप्‍पणियां:

  1. अपितु वृक्ष क़ी छांव तले
    उसका तन, मन विश्रांति पाता है/
    ....अदभुत भाव .... बेहद प्रसंशनीय रचना !!!

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  2. जब वातानुकूलित कमरों में नहीं,
    अपितु वृक्ष क़ी छांव तले
    उसका तन, मन विश्रांति पाता है/
    " बेहद सुकून देती पंक्तियाँ.."
    regards

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