शनिवार, 12 जून 2010

जीवन .. जिम्मेदारियों के बोझ तले

                                           (४) ......पिछली पोस्ट से लगातार
खट्टी मीठी जिंदगी के
टेढ़े मेढ़े रास्तों पर,
मीठे मीठे सपनो की
बात ही न्यारी है/
जिंदगी के साथ साथ
जनम लेते हैं सपने,
सपनो के साथ चलती
जिंदगी हमारी है/


पचास की आई वय,
सपनो की टूटी लय,
जिम्मेदारिया खड़ी हैं
बाहें फैलाये/
लोगों के दरवाजे पर
दस्तक दे रहा है बाप,
बेटी बड़ी हो गई है,
लड़का बताएं /
बेटा बहु अपनी ही
दुनिया के हो गए है,
कोई उनसे कहे,  
बाप का हाथ बटाएँ /
रिश्तो का घरोंदा
टूटता सा दीखता है,
अपने ही हो गए,
कितने पराये/
जीवन के रंग
फीके होते दीखते हैं,
जिम्मेदारियों का बोझ,
जिन्दगी पर भारी है/
खट्टी मीठी जिंदगी के
टेढ़े मेढ़े रास्तों पर,
मीठे मीठे सपनो की
बात ही न्यारी है...





7 टिप्‍पणियां:

  1. सबसे पहली बात...आपके ब्लॉग का रंग विन्यास मुझे मुग्ध कर गया...बहुत ही सुन्दर...
    कविता का भाव पक्ष बहुत ही सहज और सार्थक....घर घर की कहानी है ये... बहुत ही अच्छा लिखा है आपने...
    अब एक सुझाव अगर आपको उचित लगे तो...आपके ब्लॉग का शीर्षक 'प्रयास' अगर हिंदी में हो तो बात कुछ और ही हो जायेगी...
    आशा है आप इसे अन्यथा नहीं लेंगे...
    शुक्रिया...

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  2. आईये जानें .... क्या हम मन के गुलाम हैं!

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  3. बहुत बेहतरीन अभिव्यक्ति!

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  4. रिश्तो का घरोंदा
    टूटता सा दीखता है,
    अपने ही हो गए,
    कितने पराये/
    जीवन के रंग
    फीके होते दीखते हैं,
    जिम्मेदारियों का बोझ,
    जिन्दगी पर भारी है/
    खट्टी मीठी जिंदगी के
    टेढ़े मेढ़े रास्तों पर,
    मीठे मीठे सपनो की
    बात ही न्यारी है...
    वास्तविकता को सीधे सादे रंगों में प्रस्तुत करना भी एक कला है । बेटा बहू हमेशा ही छोड नही जाते आपका हाथ भी बटाते है ।

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  5. रिश्तो का घरोंदा
    टूटता सा दीखता है,
    अपने ही हो गए,
    कितने पराये/
    जीवन के रंग
    फीके होते दीखते हैं,
    जिम्मेदारियों का बोझ,
    जिन्दगी पर भारी है/
    बुढापे की तरफ बढते सभी कदमो के दिल की आवाज़ है। बहुत मार्मिक अभिव्यक्ति है आभार

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  6. .........बहुत मार्मिक अभिव्यक्ति है

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