दिवार पत्थर की हैं, संगमरमर की या फिर कच्ची हैं... घर में रिश्तों की ऊष्मा हो, तो ही अच्छी हैं...
शनिवार, 10 सितंबर 2016
शुक्रवार, 3 जनवरी 2014
गुरुवार, 17 मार्च 2011
यथार्थ
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| जिंदगी की उड़ान |
कारवां मेरा भी होता आज तब मंजिल के पास,
भोर होते चला होता, मंजिल की जानिब मै काश!
जज्बातों से क्या मिला, मंजिल मिली ना रास्ता,
तन्हाई में आंखे रोई, अक्सर रहा ये दिल उदास.
जिन्दगी भर चलता रहा, आज मगर पहुंचा वहां,
रंजो-गम-खुशियाँ कम, उथली जमीं-धुंधला आकाश.
सय्याद के रहमो करम पर कायम है जैसे वजूद,
मुहलत पर टिकी सांस, जिन्दगी चलती फिरती लाश.
एक परिंदा- एक दरिंदा, उड़ रहें हैं साथ-साथ,
एक को जीने की ख्वाहिश, एक को लहू की प्यास.
हिम्मत करके एक बाजी खेल जाएँ चल 'पवन'
हार जाने से बदतर है, हार मानने का एहसास.....
पवन धीमान
+918010369771
सोमवार, 21 फ़रवरी 2011
अभिष्ट गीत
जो ज्वलंत प्रश्न उठाता है.
सोच की पौध सींचता है जो,
दाद भले नहीं पाता है.
अब्दुल्ला और राम की कहता,
संध्या और अजान की कहता,
जो मस्जिद में खुदा और
मंदिर में भगवान् बुलाना चाहता है,
सम्रद्धि शोषण के दम पर ही हो,
ऐसा ही नहीं होता हर बार ,
स्वस्थ विकास से प्रेरणा लेता है,
सिर्फ दोष नहीं गिनवाता है.
चाक के आगे, सूत के धागे,
श्रम जहाँ स्रजनरत हो,
गीत वो यूँ बनता है ज्यों शिल्पी,
स्रष्टि नयी रचाता है.
जिसकी चिंता गिरते मानवीय मूल्य
रिश्तों के टूटते कवच,
घर की दीवारों के अन्दर भी
अब चीरहरण हो जाता है.
भोग्य नहीं नारी जननी है,
बेटी, पत्नी और बहन भी,
नर नहीं नर पिशाच है,
जो उसके बचपन को भरमाता है,
छुआछुत की रेखा गहरी है,
पर प्रेम के आगे कब ठहरी हैं,
राम, सबरी और बाल्मीकि का
कितना सुन्दर नाता है.
सभ्यता के संक्रमण काल में,
चाह उसे ऐसे यौवन की,
दर्द जमाने का बांटे जो,
नहीं भँवरे सा इठलाता है.
यह कंटक पथ गुजरे,
गीत सुखद धरातल पर पहुंचे,
तन्हाई में बैठा 'पवन'
ऐसी दुनिया के ख्वाब रचाता है.
जीवन संघर्ष
मैदाने-जंग में कुछ इस तरह लाचार होता हूँ।
शिकार नहीं करता तो खुद शिकार होता हूँ।
नफरत नहीं कर पाया कभी दुश्मन से भी मै,
मुहब्बत करता हूँ तो भी गुनाहगार होता हूँ।
बुधवार, 25 अगस्त 2010
चिरायु चाहत
ख्यालों में तस्वीर बनाता हूँ अभी तक
वह पराया गीत है अब , जानता हूँ,
तन्हाइयों में गुनगुनाता हूँ अभी तक.
दिल लगाने क़ी खता एक बार की थी,
सजा मगर हर रोज पाता हूँ अभी तक,
कोई चिड़िया पेड़ पर जब घोसला बनाती है,
शुक्रवार, 9 जुलाई 2010
विरह वेदना
पूर्णमासी के चाँद की ओर/
और विरह की सम्भावना
का पकड़कर छोर /
तुमने कहा था
कि चाँद का यह रूप
तुम्हे मेरी उदिग्नता की खबर देगा/
और तुम्हारा प्यार
मेरे सब जख्म भर देगा/
लेकिन दूरियों के
बदले समीकरण में,
चाँद जब तुम्हारी छत से
चलकर मेरे पास आता है,/
दो घडी ओझल होकर
संकेत से मुझे बताता है /
कि तुम लजाकर
मेरा प्रणय निवेदन
स्वीकार कर रही थी/
धवल चांदनी सी बिखरकर
मुझे प्यार कर रही थी/
हर शाम
चांदनी की आहट होते ही
मै खुद से बाहर निकल आता हूँ/
मुस्कान बिखेरता हूँ,
दर्द छिपाता हूँ/
मै नहीं समझता
कि यह मेरी विरह वेदना
जान पाता है/
प्रिय!
यह डाकिया
मेरे बारे में क्या बताता है?
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