शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

विरह वेदना

देखकर
पूर्णमासी के चाँद की ओर/
और विरह की सम्भावना
का पकड़कर छोर /
तुमने कहा था
कि चाँद का यह रूप
तुम्हे मेरी उदिग्नता की खबर देगा/
और तुम्हारा प्यार
मेरे सब जख्म भर देगा/
लेकिन दूरियों के 
बदले समीकरण में,
चाँद जब तुम्हारी छत से
चलकर मेरे पास आता है,/
दो घडी ओझल होकर
संकेत से मुझे बताता है /
कि तुम लजाकर
मेरा प्रणय निवेदन
स्वीकार कर रही थी/
धवल चांदनी सी बिखरकर
मुझे प्यार कर रही थी/
हर शाम
चांदनी की आहट होते ही
मै खुद से बाहर निकल आता हूँ/
मुस्कान बिखेरता हूँ,
दर्द छिपाता हूँ/
मै नहीं समझता
कि यह मेरी विरह वेदना
जान पाता है/
प्रिय!
यह डाकिया
मेरे बारे में क्या बताता है? 

21 टिप्‍पणियां:

  1. लेकिन दूरियों के
    बदले समीकरण में,
    चाँद जब तुम्हारी छत से
    चलकर मेरे पास आता है,/
    दो घडी ओझल होकर
    संकेत से मुझे बताता है /
    कि तुम लजाकर
    मेरा प्रणय निवेदन
    स्वीकार कर रही थी/
    किसी से दूर रहना कितना कष्ट देता है मगर प्यार के क्षण और अनुभूतियो, कल्पनाओं मे क्या कुछ देखता सोचता रहता है। बहुत अच्छी लगी आपकी रचना। शुभकामनायें

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  2. प्रिय!
    यह डाकिया
    मेरे बारे में क्या बताता है ...

    चाँद तो प्यार का संदेश देता है ... दर्द से अंजान रहता है .....
    बहुत अनुपम रचना है ...

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  3. "चाँद .....
    दो घडी ओझल होकर
    संकेत से मुझे बताता है...."
    पंक्तियाँ चाँद को एकदम अलग रूप में महसूस कराती हैं...
    विरह की तपिश लिए इस खूबसूरत, नाजुक सी रचना के लिए सलाम.

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  4. kisi bhi rachna ko khoobsurat banane mein chaand shabd hi kafi hota hai ...pata nahi kitna pyar chhupa hai is chaand mein ....bahut din baad koi kavita padhi...dil khush sa ho gaya hai ....aur kisi ki yaad bhi ..dhanaybad !!!

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  5. पवन, प्यार को नयी सम्वेदना के सांचे में ढालने की तुम्हारी कोशिश सार्थक लगती है। तस्वीर उस शाब्दिक उजास को और गहरा करने में सक्षम है। बहुत सारी शुभकामनायें। मै तुम्हारे ब्लाग का इंक बत-बेबात पर जोड़ रहा हूं।

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  6. चाँद जब तुम्हारी छत से
    चलकर मेरे पास आता है....
    roze aattaa hai chand
    bin kuch khe
    kion chala jatta hai???
    Kitna achaa lagta hai jab hum
    apno ka sandesh chand se pa lete hai.

    Hardeep

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  7. कि तुम लजाकर
    मेरा प्रणय निवेदन
    स्वीकार कर रही थी/
    धवल चांदनी सी बिखरकर
    मुझे प्यार कर रही थी...

    Beautifully expressed...badhai

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  8. ghazal ko apna pyar dene ke liye dhanyawaad. is bahane yahaan bhi aana hua. aapki teen kavitaayen padhi. teeno utkrisht hai apne kathya kee eemaandaaree ke kaaran.
    किसी से दूर रहना कितना कष्ट देता है मगर प्यार के क्षण और अनुभूतियो, कल्पनाओं मे क्या कुछ देखता सोचता रहता है
    bahut badhiya.

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  9. bahut khoob janaab
    yun hi likhte rahen...
    maa sarswati ki kirpa aap per
    bani rahe..........

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  10. मुस्कान बिखेरता हूँ,
    दर्द छिपाता हूँ/
    मै नहीं समझता
    कि यह मेरी विरह वेदना
    जान पाता है/
    प्रिय!
    यह डाकिया
    मेरे बारे में क्या बताता है?

    वाह ...वाह.......क्या बात है .......!!

    प्यार को नयी उपमाओं से सजाकर आपने नए आयाम दिए हैं ....

    बहुत सुंदर रचना ......!!

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  11. चांदनी की आहट होते ही
    मै खुद से बाहर निकल आता हूँ/
    मुस्कान बिखेरता हूँ,
    दर्द छिपाता हूँ/
    मै नहीं समझता
    कि यह मेरी विरह वेदना
    जान पाता है/
    प्रिय!
    यह डाकिया
    मेरे बारे में क्या बताता है?

    बहुत ही सुन्‍दरता से व्‍यक्‍त गहरे भाव, अनुपम प्रस्‍तुति ।

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  12. waah...!!!
    bahut sunder rachna............expressions bhi bahut ache lage...!!!

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  13. प्रिय!
    यह डाकिया
    मेरे बारे में क्या बताता है?
    ..बहुत सुंदर.
    चाँद तो पुराना डाकिया है मगर ऐसे खत रोज-रोज कहाँ मिलते हैं!

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  14. waah piry ye dakiya mere bare mein kya batataa hai
    kya kamaal kaha hai aapki nazm bahut pasand aayi

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  15. main theek se samajh nahi paaya kavita ko...iska flow bahut pasand aaya par ek jo mool arth hai wo main ubhaar nahi paaya..kuch madad kare

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